जब राम लौटे, तब पूजन लक्ष्मी-गणेश का क्यों?

 

दिवाली पर हम लक्ष्मी और गणेश की पूजा क्यों करते हैं — श्री राम की नहीं ?


भारतीय संस्कृति में प्रत्येक उत्सव केवल उल्लास नहीं, अपितु एक तत्वचिंतन है।

दीपावली का पर्व उसी तत्वचिंतन का उज्ज्वल प्रतीक है —

जहाँ दीप का प्रकाश केवल बाह्य जगत को नहीं, अपितु अंतःकरण के अंधकार को भी दूर करता है।


यह प्रश्न अनेक भक्तों के हृदय में उद्भवित होता है —

“जब दीपावली श्रीराम के अयोध्या आगमन की स्मृति है, तब इस रात्रि में पूजन श्रीलक्ष्मी और श्रीगणेश का क्यों?”


इस प्रश्न का उत्तर धर्म के सूक्ष्म दर्शन में निहित है —

जहाँ लक्ष्मी समृद्धि की ऊर्जा हैं, गणेश विवेक के अधिष्ठाता, और राम धर्म के प्रकाशस्वरूप।

दीपावली का सच्चा संदेश इसी त्रिवेणी में समाहित है —

कि धन विवेक के साथ, और धर्म करुणा के साथ ही मंगलकारी होता है।


लेखक दृष्टिकोण :

दीपावली केवल उत्सव नहीं, एक दार्शनिक प्रतीक है — प्रकाश का अंधकार पर, विवेक का अज्ञान पर, और मर्यादा का अधर्म पर विजय का प्रतीक।


फिर भी, यह प्रश्न अनादि काल से जिज्ञासु हृदयों में उठता रहा है —

“जब यह पर्व श्रीराम के अयोध्या आगमन की स्मृति में मनाया जाता है, तब उस रात्रि में पूजन लक्ष्मी और गणेश का क्यों किया जाता है?”


इस प्रश्न का उत्तर हमारे धर्म के गूढ़ रहस्यों में निहित है — जहाँ लक्ष्मी की कृपा और गणेश का विवेक मिलकर जीवन के समग्र संतुलन की रचना करते हैं।


१. दिवाली का द्वैत स्वरूप : अलौकिक संगम


पुराणों के अनुसार, दीपावली दो दिव्य घटनाओं का संगम है —


सतयुग में समुद्र मंथन के समय मां लक्ष्मी का अवतरण — जब अमृत, सौभाग्य और दैवी संपन्नता पृथ्वी पर प्रकट हुई।


और त्रेता युग में भगवान श्रीराम का अयोध्या लौटना — जब धर्म, मर्यादा और प्रेम ने पुनः राज्य प्राप्त किया।



अतः दीपावली केवल एक इतिहास नहीं, बल्कि धर्म और धन, मर्यादा और महिमा, प्रकाश और प्रज्ञा — इन समस्त मूल्यों का उत्सव है।


२. लक्ष्मी और गणेश का पूजन — धन और विवेक का संगम


स्कंदपुराण में वर्णित कथा के अनुसार, जब मां लक्ष्मी ने अपने धन का संपूर्ण वितरण किया, तब उन्हें ज्ञात हुआ कि केवल धन देना पर्याप्त नहीं —

वह तभी शुभ है जब वह विवेक और नीति के साथ जुड़ा हो।


तभी उन्होंने अपने आशीर्वाद को भगवान गणेश से जोड़ा — जो बुद्धि, संतुलन और शुभारंभ के अधिष्ठाता हैं।

यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है —


“धन वही शुभ है जो विवेक के मार्ग से प्राप्त हो;

और बुद्धि वही पवित्र है जो लोककल्याण में प्रयुक्त हो।”


३. दिवाली की रात्रि — जब धन और बुद्धि एक साथ अवतरित होते हैं


अमावस्या की रात्रि में जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब महालक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं

उनके साथ श्री गणेश भी आते हैं, ताकि संपन्नता के साथ-साथ संयम और सद्बुद्धि भी जग में स्थिर हो।


इसलिए इस रात्रि का पूजन किसी “एक देवता” का नहीं, बल्कि समग्र जीवन-संतुलन का प्रतीक है —

जहाँ लक्ष्मी धन देती हैं, गणेश दिशा देते हैं, और राम धर्म का दीप जलाते हैं।


४. दिव्य श्लोक और आशीर्वचन


श्लोकम् :

या लक्ष्मी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥


भावार्थ :

मां महालक्ष्मी सम्पूर्ण सृष्टि में मातृरूप से विद्यमान हैं।

वे ही समृद्धि का मूल, दान का कारण और जीवन की मधुरता की अधिष्ठात्री हैं।

उनकी कृपा से प्रत्येक हृदय में उजाला, उत्साह और उन्नति का अमृत प्रवाहित हो।


श्लोकम् :

वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥


भावार्थ :

हे श्री गणेश! आप महाकाय हैं, आपकी ज्योति सूर्य-कोटि के समान है।

आप हमारे प्रत्येक कार्य से विघ्नों को दूर करें,

और हमें विवेक, धैर्य और सत्य मार्ग पर स्थिर रखें।


श्लोकम् :

श्रीरामं रघुपतिं वन्दे, करुणासागरं प्रभुम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय, सदा नतं मनो मम॥


भावार्थ :

मैं भगवान श्रीराम को नमन करता हूँ — जो करुणा, मर्यादा और धर्म के अवतार हैं।

उनकी दया से हमारा जीवन सत्य, करुणा और संतुलन से आलोकित रहे।

उनके आदर्श हमारे अंतर्मन में मर्यादा और प्रेम का दीप सदा प्रज्वलित रखें।


५. समापन : दिवाली का आध्यात्मिक संदेश


दिवाली हमें स्मरण कराती है कि —

प्रकाश केवल दीप में नहीं, अपितु विवेक में है;

धन केवल लक्ष्मी में नहीं, अपितु धर्म में है;

और राम केवल अयोध्या में नहीं, अपितु हमारे अंतःकरण में हैं।


अतः जब हम दीप जलाएँ, तो साथ ही अपने भीतर का अंधकार मिटाएँ।

जब हम लक्ष्मी का स्वागत करें, तो विनम्रता और दान का भाव जागृत करें।

और जब “जय श्रीराम” कहें — तो स्मरण रखें कि वह जय मानवता की है।

जय श्री राम! जय महालक्ष्मी! जय गणेश! 🙏🏻



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