कोई क्या कहेगा? अनकही और अनसुनी बातें...!

 “कोई क्या कहेगा ?” - एक वाक्य जिसने हमारी ज़िंदगी की दिशा बदल दी !

(लेखक – राकेश कुशवाहा)


हम हर काम से पहले यह सोचते हैं -  लोग क्या कहेंगे?

पर ज़रा सोचिए, अगर ‘लोगों’ की जगह ‘खुद’ को रख दें,
तो जीवन कितना हल्का और सच्चा हो जाएगा।”

कभी-कभी हम दूसरों की नज़रों में सही दिखने की कोशिश में,
अपने ही मन की शांति खो बैठते हैं।
यह कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं,
बल्कि हर उस इंसान की है जो “कोई क्या कहेगा” के डर में जी रहा है।
आइए, आज इस डर को एक मुस्कुराती कहानी की तरह पढ़ते हैं जो शायद आपके भीतर की सोच को नया रास्ता दिखा दे।

भूमिका (Intro)

आज का लेख उस अदृश्य डर पर आधारित है जो हर घर, हर परिवार और हर समाज में पलता है ,
“कोई क्या कहेगा?”
यही डर हमारी खुशियों को रोकता है, रिश्तों में दूरी लाता है और जीवन को दूसरों की सोच की जंजीरों में बाँध देता है।
हमारा समाज संस्कारों से भरा है, लेकिन कभी-कभी यही संस्कार बोझ भी बन जाते हैं।
देर तक सोना आलस्य का प्रतीक माना जाता है, और हमारे संस्कारी समाज में आलस्य को कोई जगह नहीं।
पर क्या हर बार यह सोच सही होती है? आइए, इस सवाल को एक गाँव के सादे जीवन के दृश्य से समझते हैं।

गाँव का दृश्य

एक गाँव में एक व्यक्ति अपने घर के बाहर चबूतरे पर सुबह देर तक सोया रहा।
बेचारा रातभर खेत में पानी भरकर लौटा था — थका हारा, निढाल।
किसी को तकलीफ़ न हो, इसलिए ज़मीन पर ही लेट गया।

सुबह जब पत्नी ने देखा तो बोली,
“कैसे लेटे हो? कोई देखेगा तो क्या सोचेगा, क्या कहेगा?”
पति झटपट उठा, पत्नी अभी-अभी भीतर से जो चारपाई लाई थी, उस पर जाकर लेट गया।

थोड़ी देर बाद पत्नी फिर आई,
“क्यों ऐसे सो रहे हो, बिना बिस्तर लगाए ? कोई देखेगा तो क्या कहेगा?”
पति ने बिस्तर लगाया और फिर सो गया

कुछ देर बाद पत्नी ने फिर आकर कहा,
“हाय राम! कोई देखेगा तो क्या कहेगा ? इतनी देर तक कोई सोता है वो भी बाहर बरामदे में !”
पति बेचारा उठ गया और अंदर आँगन में जाकर लेट गया।

थोड़ी देर में पत्नी फिर बोली,
“कुछ लाज-शरम है कि नहीं? कोई घर में झाँक लेगा तो क्या बोलेगा? उठो, नहा-धो लो।”

पति ने थोड़ी देर ऐसे ही बैठकर आँखें मूँद लीं और मौका पाकर कमरे के भीतर जाकर लेट गया।
पत्नी को लगा कि पति बाहर चले गए हैं, तो वह निश्चिंत होकर घर का काम करने लगी।

कुछ देर बाद जब वह कमरे में पहुँची तो ज़ोर से चिल्लाई —
“अरे, मेरी तो मति मारी गई! ऐसा आलसी पति पाया मैंने! कोई घर में घुस आया तो क्या कहेगा? निकलो यहाँ से, जहाँ मन हो वहीं जाओ — बस घर में मत सोना अब!”

बेचारा पति चबूतरे पर जाकर बैठ गया।
नींद आँखों में भरी थी, मगर “ज़माने की बातों” का डर और अधिक भारी था।

थोड़ी देर सोचने के बाद उसे एक तरकीब सूझी,
वह चुपचाप घर की छत पर चढ़ गया और चैन की नींद सो गया।

पर यह चैन भी ज़्यादा देर का न था।
पत्नी ने जब उसे छत पर सोते देखा तो धीरे से जाकर पकड़ लिया।
कुछ पल तक वह चुप खड़ी रही, फिर दया और प्यार से बोली,
“सुनो जी, कोई देखेगा तो क्या कहेगा? किसी को लगेगा आप बीमार हैं। क्यों बदनामी करवाना चाहते हो? चलिए नीचे आइए, नहा-धोकर खाना खा लीजिए। फिर दोपहर में आराम कर लीजिए।”

समाज और संस्कार

पत्नी भी ज़माने की ख़ातिर मजबूर थी।
वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती थी, क्योंकि गाँव में सुबह देर तक सोना संस्कारों के विरुद्ध माना जाता है।
भले ही औरतें दिनभर की मेहनत से थकी हों, पर सबेरे उठना उनका धर्म समझा जाता है।
अब इसे आप मजबूरी कहें या संस्कार, यह निर्णय मैं आप पर छोड़ता हूँ।

“कोई क्या कहेगा”, यह वाक्य पीढ़ियों से हमारे समाज में घुला हुआ है।
शादी-ब्याह से लेकर रोज़मर्रा की बातों तक, हर जगह यह डर साथ चलता है।
कुछ माता-पिता अपने बच्चों को अनचाहे डाँटते हैं,
कुछ सासें बहुओं पर चिल्लाती हैं,
कुछ बॉस अपने कर्मचारियों पर गुस्सा निकालते हैं,
बस इसलिए कि “कोई कुछ न कह दे।

समापन विचार

“कोई क्या कहेगा?”
इसका जवाब शायद भगवान ही दे सकते हैं।

मेरा काम तो बस आपको आगाह करना है,
ज़माने की परवाह करते-करते कहीं अपने, अपनेपन को खो मत देना।
जिन्हें आप आज “लोग क्या कहेंगे” सोचकर डाँटते हैं,
कल वही चेहरे शायद आप देखने को भी तरस जाएँ।


धन्यवाद 🙏🏻

मुझे उम्मीद है कि आपको यह लेख पसंद आया होगा।
अपने विचारों से अवश्य अवगत कराएँ,
क्योंकि आपकी राय ही मेरे अगले लेख की प्रेरणा है।

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