लोग झूठ क्यों बोलते हैं? मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण
लोग झूठ क्यों बोलते हैं? – एक आध्यात्मिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण झूठ बोलना मानवीय स्वभाव का सामान्य अंग बन चुका है। अक्सर यह किसी बुरी नीयत से नहीं, बल्कि भय, असुरक्षा या संबंधों की रक्षा के भाव से उपजता है। १. भय से उपजा झूठ जब व्यक्ति डरता है — असफलता, दंड या अपमान के भय से , तब झूठ उसके लिए एक ढाल बन जाता है। यह क्षणिक समाधान तो देता है, परंतु मन की शांति छीन लेता है। २. भ्रम और विचलन का साधन झूठ कभी-कभी ध्यान भटकाने या सच्चाई को छिपाने का माध्यम बनता है। यह तात्कालिक राहत तो देता है, पर अंततः अविश्वास और जटिलता को जन्म देता है। ३. मनोवैज्ञानिक औषधि के रूप में झूठ कभी-कभी झूठ औषधि की तरह कार्य करता है। लोग अपने बारे में मीठी बातें सुनना पसंद करते हैं। इसी चाह में हम अपने मालिक, सहकर्मी, मित्र या परिजनों को खुश करने के लिए झूठे प्रसंग रचते हैं। ४. सत्य कहने का समय हर सत्य बोलने का एक उपयुक्त समय होता है। कभी-कभी तुरंत कही गई सच्चाई चोट पहुँचाती है। इसलिए लोग प्रतीक्षा करते हैं, जब परिस्थितियाँ अनुकूल हों, तब सत्य प्रकट करते हैं। ५. खोने के भय से उपजा झूठ जब हम किसी को अत्यधि...